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Thursday 27th of July 2017
Articles

हज़रत फातिमा मासूमा (अ)

हज़रत मासूमा का पहली जिल्क़ादा साल 173 हिजरी मे मदीने मे जन्म हुआ.कुरान समाचार (iqna)  इस्फहान शाखा के मुताबिक़ मासूमा ने 1 ज़िल्कादा साल 173 हिजरी मदीने मे आँख खोली,और 10 ...

हजरत फातेमा मासूमा

आप का इस्मे मुबारक फ़ातिमा है! आप का मशहूर लक़ब "मासूमा" है! आप के पिता शियों के सातवें इमाम हज़रत मूसा इब्न जाफ़र (अ:स) हैं और आप की माता हज़रत नजमा ख़ातून हैं, और यही महान स्त्री ...

हज़रत मासूमा

सर्वसमर्थ व महान ईश्वर से निकट होने का एक मार्ग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों से प्रेम है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व ...

वाकेआ ऐ हुर्रा

ये वाकिआ 63 हिजरी के ज़िलहिज्जा के महीने मे पेश आया (1)और वाकेआ ऐ हुर्रा के नाम से मशहूर हुआ।(2) करबला के खूनी वाकेऐ के बाद लोग यज़ीद की खबासत और बेदीनी को जान गऐ थे इसलिऐ लोगो ...

ख़ुत्बाए इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0) (बाज़ारे कूफ़ा में)

अल्लाह की हम्द व सना और रिसालतमाब पर दुरूद व सलाम के बाद आपने इरशाद फ़रमाया --जो मुझे जानता है सो जानता है और जो नहीं जानता वह जान ले के मैं अली (अ0) इब्निल हुसैन (अ0) इब्ने अली (अ0) ...

जीवन में प्रगति के लिए इमाम सादिक (अ) की नसीहतें

इमाम सादिक़ (अ) के ज़माने के लोग इमाम (अ) के ज्ञानात्मक और आध्यात्मिक स्थान से भलीभांति परिचित थे इसलिए जब भी उन्हें मुलाक़ात का सौभाग्य प्राप्त होता था तो आपसे नसीहत व ...

क्या क़ुरआन क़ानून की किताब है?

वाज़ेह रहना चाहिये के जिस तरह क़ुरआन आम किताबों की तरह की किताब नही है। इसी तरह आम दसातीर (क़ानूनों) की तरह का दस्तूर (क़ानून) भी नही है।दस्तूर (क़ानून) का मौजूदा तसव्वुर ...

पवित्र क़ुरआन और धर्मांधियों का क्रोध

पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम (स) का अमर चमत्कार और कभी समाप्त न होने वाले उच्च ज्ञान तथा तत्वदर्शिता का भण्डार है। यह ईश्वरीय पुस्तक उचित तथा अनुचित विचारों और ...

क़ुरआन पढ़ते ही पता चल गया कि यह ईश्वरीय ग्रंथ है।

आस्ट्रेलिया की नागरिक ज़ैनब टेलर इस्लाम धर्म के वैभव के समक्ष नतमस्तक हो गयीं और धर्म की उच्च शिक्षाओं से लाभान्वित हो रही है। उन्होंने जून वर्ष 2005 में हज़रत फ़ातेमा के ...

आयतुल कुर्सी

अहमद बड़ी ग़मगीन हालत में अपनी दादी के बारे में सोच रहा था। पुरानी यादों के साथ-साथ आँसुओं का एक सैलाब उसकी आँखों से जारी था। परदेस में दादी की मौत की ख़बर ने उसे हिला कर रख ...

इमामे सादिक़ (अ.स) की शहादत

तारीख़ों से पता चलता है कि मंसूर ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ0) को मुतअदिद बार ज़हर के ज़रिये शहीद कराने की कोशीश की मगर चूकि मशीयते ईज़दी की तरफ़ से अय्यामे हयात बाक़ी थे इसलिये ...

इमाम अली की निगाह मे कसबे हलाल की जद्दो जहद

आपके नज़दीक कसबे हलाल बेहतरीन सिफ़त थी। जिस पर आप खुद भी अमल पैरा थे। आप रोज़ी कमाने को ऐब नहीं समझते थे और मज़दूरी को बहुत ही अच्छी निगाह से देखते थे। मोहद्दिस देहलवी का ...

इमाम अली की ख़ामोशी

आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि जब खि़लाफ़त इमाम अ़ली का हक़ था तो क्यु आपने पैग़म्बर के स्वर्गवास के बाद अपने हक़ को अबूबकर, उस्मान या उमर से लेने की कोशिश नहीं की?इस सवाल के ...

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम

माता पिताहज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम तथा आपकी माता हज़रत फ़ातिमा ज़हरा थीं। आप अपने माता पिता की प्रथम संतान थे।जन्म तिथि व जन्म ...

8 शव्वाल, जन्नतुल बक़ी और वहाबियत के अत्याचार।

8 शव्वाल इतिहास का ऐसा दर्दनाक दिन है जो हर बार अहले बैत अ.स. और उन के घराने से मोहब्बत रखने वाले के दिल को ज़ख़्मी कर देता है, और ऐसा होना स्वभाविक है क्योंकि अहले बैत अ.स और ...

जन्नतुल बक़ी

जन्नतुल बक़ीअ तारीख़े इस्लाम के जुमला मुहिम आसार में से एक है, जिसे वहाबियों ने 8 शव्वाल 1343 मुताबिक़ मई 1925 को शहीद करके दूसरी कर्बला की दास्तान को लिख कर अपने यज़ीदी किरदार और ...

जन्नतुल बकी मे दफ्न शख्सियात

1.    जनाबे फातेमा ज़हरा (स.अ.) 11 हिजरी 2.    इमाम हसन अलैहिस्सलाम 50 हिजरी 3.    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम  94 हिजरी 4.    इमाम मौहम्मद बाक़िर ...

दावत नमाज़ की

देता हूँ दोस्तों तुम्हें दावत नमाज़ कीतकदीर वाले पाते हैं दौलत नमाज़ कीजिस घर के लोग करते हैं इज्ज़त नमाज़ कीउस घर में पाइ जाती है बरकत नमाज़ कीदोनों जहां में रहता है वो आन शान ...

रहबर है मुस्तुफा

इंसानियत के हादीओ रहबर है मुस्तुफादरयाए मारेफत के शनावर है मुस्तुफाखत्मे रसुल है खास्साऐ दावर है मुस्तुफामौलाए जा है शाफाऐ महशर है मुस्तुफाखल्लाक़े दोजहाँ ने इन्हे ...

क़सीदा

तशनाकामी बेकसी ग़ुरबत फ़रेबे दुश्मनांनोके ख़न्जर ,बारिशे पैकां बलाऐ ख़ूंचकां है दमें शमशीर से भी तेज़ तर राहे जहांहर क़दम इक मरहला है हर नफ़्स इक इम्तेहां ज़िन्दगी ...