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Saturday 19th of October 2019
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बहरैन नरेश के आश्वासनों पर जनता को विश्वास नहीं

बहरैन में मानवाधिकार के व्यापक स्तर पर उल्लंघन के बारे में जांच समिति के गठन के लिए इस देश के शासक के तय्यार हो जाने के बावजूद, विपक्ष ने विरोध प्रदर्शन कर आले ख़लीफ़ा शासन के अंत की मांग दोहराई।

बहरैन में मानवाधिकार के व्यापक स्तर पर उल्लंघन के बारे में जांच समिति के गठन के लिए इस देश के शासक के तय्यार हो जाने के बावजूद, विपक्ष ने विरोध प्रदर्शन कर आले ख़लीफ़ा शासन के अंत की मांग दोहराई। बहरैन के शासक शैख़ हमद बिन ईसा आले ख़लीफ़ा के इस देश में हालिया घटनाओं में मानवाधिकार के उल्लंघन के बारे में जांच समिति के गठन पर सहमति से संबंधित दिए गए बयान के पश्चात हज़ारों की संख्या में विपक्ष के कार्यकर्ताओं ने राजाधानी मनामा, सनाबस और मूसला सहित विभिन्न नगरों में विरोध प्रदर्शन कर आले ख़लीफ़ा शासन के अंत और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की तुरंत रिहाई की मांग की। बहरैन में विरोध करने वालों के जनसंहार पर मानवाधिकार के रक्षक संगठनों की ओर से बढ़ती आलोचनाओं के पश्चात इस देश के शासक ने इस देश की जनता के दमन व जनंसहार में अपनी भूमिका को छिपाने के उद्देश्य से तथा जनता की ओर से तीव्र दबाव के कारण जो आले ख़लीफ़ा शासन के अंत की मांग कर रही है, विवश होकर एक जांच समिति के गठन की घोषणा की जो पिछले कुछ महीनों में बहरैन में हुई हृदय विदारक घटनाओं की जांच करेगी। बहरैन के शासक ने इससे पूर्व इस देश के संकट को नियंत्रित करने के लिए विपक्ष के साथ वार्ता का प्रस्ताव रखा था जिसे विपक्ष ने रद्द करते हुए, प्रस्ताव को वर्तमान संकट से निकलने के लिए आले ख़लीफ़ा शासन का हत्कंडा बताया। बहरैन के क्रांतिकारियों ने इन वार्ताओं के प्रस्ताव को रद्द करते हुए बल दिया है कि आले ख़लीफ़ा शासन का विरोधियों को वार्ता का प्रस्ताव एक विफल प्रयास है जिसका कोई परिणाम नहीं निकलेगा। पिछले तीन महीनों के दौरान बहरैनी जनता ने सड्कों पर शांतिपूर्ण रैलियों द्वारा बहरैन के सत्ताधारियों के आर्थिक भ्रष्टाचार व भेदभावपूर्ण व्यवहार पर विरोध जताया किन्तु बहरैनी शासन ने इन शांतिपूर्ण रैलियों के जवाब में प्रदर्शनकारियों का दमन किया और बहुत से प्रदर्शनकारियों की हत्या की या उन्हें घायल किया। बहरैन में विपक्षी नेताओं के अनुसार हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों ने ढाई सौ प्रदर्शनकारियों की हत्या और हज़ारों प्रदर्शनकारियों को घायल, गिरफ़तार या उन्हें नौकरी से निकाल दिया है। यह ऐसी स्थिति में है कि आले ख़लीफ़ा शासन बहरैन में रक्तरंजित दमन में शहीद होने वालों की संख्या केवल 35 कह रहा है। बहरैन में जन प्रदर्शनों के तीव्र होते ही शैख़ ईसा की सरकार ने फ़ार्स खाड़ी सहकारिता परिषद के सदस्य देशों से बहरैन के लिए सैनिक भेजने की अपील की जिसके कुछ ही समय के पश्चात सउदी अरब और संयुक्त अरब इमारात ने सैकड़ों सैनिकों को दसियों टैंकों और बक्तर बंद वाहन के साथ भेज कर बहरैन की सेना की विपक्ष के कार्यकर्ताओं के दमन में प्रत्यक्ष रूप से मदद की। राजनैतिक कार्यकर्ताओं के अनुसार बहरैन में विदेशी सैनिकों द्वारा गिरफ़तार किए गए प्रदर्शनकारियों में से बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों की आले ख़लीफ़ा शासन की जेलों में मध्ययुगीन काल की यातनाओं के कारण मृत्यु हो गयी। मानवाधिकार संगठन इससे पूर्व बारंबार बहरैनी शासन के व्यवहार और विपक्षी कार्यकर्ताओं के जनसंहार पर विरोध जता चुके हैं और वे बहरैन में अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के भेजे जाने की मांग कर चुके हैं। ( हिन्दी एरिब डाट आई आर के धन्यवाद क साथ.)

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